मध्यप्रदेश में ग्रामीण विद्युतीकरण - लक्ष्य एवं उपलब्धियाँ
ए.के. पाण्डेय 1 एवं बी.एल. सोनेकर 2’
1आचार्य, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं.र.शु.वि. रायपुर।
2व्याख्याता, अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं.र.शु.वि. रायपुर।
सारांशरू
विद्युतीकरण देश का एक अभिन्न अंग बन गये हैं चाहे वह देश की अर्थव्यवस्था के लिए हो या ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए। इनका महत्व दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है। चुँकि भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर सिंचित भूमि के क्षेत्र को बढ़ाने के लिए विद्युतीकरण के द्वारा ट्यूबवेल की सहायता से सिंचित भूमि का क्षेत्र बढ़ाया जा रहा है और कृषि उत्पादन में क्रांति लायी जा रही है। इसी प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी एवं निर्धनता को दूर करने के लिए विद्युतीकरण द्वारा लघु एवं कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
महत्वरू
ग्रामीण विद्युतीकरण से आशय ग्रामों में विद्युत पहुँचाने एवं कृषि हेतु सिंचाई पम्पों के माध्यम से पानी पहँुचाकर कृषि उत्पादन में वृद्धि करने से है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत वे समस्त परिवर्तन शामिल होते हैं जो किसी उपक्रम के मशीनीकरण, किसी नवीन उद्योग की स्थापना इत्यादि के फलस्वरूप घटित होते हैं। इस प्रकार यह एक प्रक्रिया है जो ग्रामीण क्षेत्र के समुचित विकास को गति प्रदान करती है। ग्रामीण विद्युतीकरण निगम ने 35 वर्षों के अपने कार्यकाल में अब तक देश के 95 प्रतिशत गाँवों का विद्युतीकरण करने में सफलता प्राप्त की है। सन् 2010 तक देश के सभी गाँवों मंे बिजली पहुँचाने में का लक्ष्य है।
ब्रम्हस्वरूप के अनुसार ‘‘यंत्र और मानव की गति तथा योजनाओं के आकार का निर्धारण करने में विद्युतीकरण् महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करती है। पिछले कुछ वर्षों से विद्युतीकरण और ग्रामीण जनता में जो घनिष्ठ संबंध होते आ रहे हैं उनसे भलीभाँति यह सिद्ध हो गया है कि विद्युतीकरण और ग्रामीण जनता में जो संबंध स्थापित होते हैं, वह दिखावटी और अस्थायी नहीं होते। विद्युत के आकस्मिक परिवर्तन से विभिनन योजनाओं में अनिश्चितता उत्पन्न हो जाती है और व्यापार, वाणिज्य, उद्योग आदि क्षेत्रों में उनकी जीवन गति एक सी हो जाती है। इसी प्रकार योजना उद्योग व ग्रामीण जनता को विद्युत प्रदान करने वाली योजना का नाम है - ग्रामीण विद्युतीकरण।’’
प्रारम्भ में विद्युत की आवश्यकता रौशनी हेतु महसूस की गयी थी, लेकिन धीरे-धीरे आज विद्युत का उपयोग जीवन के हर क्षेत्र में एक अनिवार्य अंग बन गया है। विद्युत कृषि एवं उद्योग दोनों के लिए एक अत्यंत जरूरी आगत है। अतः राष्ट्र की उन्नति के लिए विद्युत शक्ति का होना आवश्यक है। किसी भी राष्ट्र की प्रगति विद्युत क्षमता से आंकी जा सकती है। शायद इसीलिए यंत्र और मनुष्य में कहा गया है कि ‘‘विद्युत आधुनिक समाज की अंतरात्मा है।’’
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बिजली का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सिंचाई और खेती-बाड़ी के अन्य कार्यों में बिजली का उपयोग लगातार बढ़ रहा है। इसके अलावा सड़कों और घरों में रौशनी करने, रेडियों, दूरदर्शन जैसे मनारंजन और सूचना के माध्यमों तथा पढ़ाई-लिखाई के लिए भी बिजली इस्तेमाल की जाती है। बिजली की पहुँच से गाँवों के सामाजिक जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है।
अध्ययन का उद्देश्यरू
1. ग्रामीण विद्युतीकरण का लक्ष्य एवं उपलब्धी को ज्ञात करना।
2. अध्ययन के विश्लेषण से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर उचित सुझाव देना।
अध्ययन की अवधिरू
प्रस्तुत अध्ययन की अवधि कुल 10 वर्षों की अर्थात् वर्ष 1990-91 से वर्ष 2000 तक है।
शोध-पद्धतिरू
प्रस्तुत शोध द्वितीय आँकड़ों पर आधारित है। आँकड़ों का संकलन मुख्य रूप से वार्षिक प्रतिवेदन, मध्यप्रदेश विद्युत मंडल, जबलपुर, म.प्र. तथा विद्युत मंडल से संबंधित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से किया गया है।
अध्ययन का विश्लेषणरू
ग्रामीण विद्युतीकरण के लक्ष्य में उपलब्धि
तालिका क्रमांक 1
वर्ष सिंचाई पम्प हेतु विद्युत प्रदाय
लक्ष्य संख्या उपलब्धि संख्या प्रतिशत
1990.91 85000 85500 100.59
1991.92 39600 58315 147.26
1992.93 56000 50198 89.64
1993.94 50000 38478 76.96
1994.95 40000 472002 118.00
1995.96 50000 41855 84.00
1996.97 62500 44882 71.81
1997.98 35340 52699 149.12
1998.99 25000 45857 183.43
1999.00 12000 23235 193.62
तालिका से ज्ञात होता है कि वर्ष 1990-91 से 1999-2000 के बीच सिंचाई पम्प हेतु जो विद्युत प्रदाय किया गया है, उसमें केवल चार वर्षों (1992, 93, 94, 95, 96 और 97) में ही उपलब्धि लक्ष्य से कम रहा है, जबकि शेष वर्ष अधिक रहा है, जो आर्थिक विकास के सूचक को दर्शाता है।
सुझावरू
मध्यप्रदेश में विद्युत आयोजन का मूल उद्देश्य प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना तथा सामान्य जनमानस के जीवन स्तर में सुधार लाना है। अतः उद्देश्य की पूर्ति के लिए विद्युत ऊर्जा की आयोजना में विभिनन स्तरों तथा पक्षों का समावेश करना आवश्यक है। एतदर्थ निम्नलिखित उपाय अपनाने की आवश्यकता है -
1ण् विद्युत ऊर्जा क्षेत्र का अर्थव्यवस्था के अन्य विकास संगठनों एवं संस्थाओं जैसे आंतरिक जल स्त्रोत सर्वेक्षण एवं विकास एजेन्सी, ग्रामीण विद्युतीकरण निगम, साख संस्थाएँ, राज्य विद्युत मंडलों, कृषि विकास समिति, लघु सिंचाई परियोजना समिति आदि से उचित सामंजस्य स्थापित किया जाना चाहिए, जिससे आर्थिक विकास को गति मिल सके।
2ण् विद्युत ऊर्जा के वितरण में क्षेत्रीय असंतुलन की प्रकृति को न्यूनतम किया जाय, जिससे प्रदेश का संतुलित आर्थिक विकास संभव हो सके।
3ण् विद्युत ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि तथा उत्पादन केन्द्रों की स्थापित क्षमता का पूर्ण उपयोग किया जाय।
4ण् प्राकृतिक संसाधनों के अन्य वैकल्पिक उपयोगों को संभव बनाने के लिए ताप-विद्युत ऊर्जा के अतिरिक्त पन-विद्युत ऊर्जा, सौर ऊर्जा के विकास तथा ऊर्जा के अन्य स्त्रोतों को विकसित किया जाय।
5ण् विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति में होने वाले रिसावों को रोका जाय।
6ण् विद्युत के पारेषण एवं वितरण व्यवस्था को नियमित एवं व्यवस्थित बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये जाय, जिससे निहित खतरों को न्यूनतम किया जा सके।
7ण् समाज के निर्धन एवं कमजोर वर्गाें को विद्युत प्रदान करने तथा उन्हें समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष प्रगतिशील बनाने की दिशा में पर्याप्त ध्यान दिया जाय।
8ण् ग्रामीण क्षेत्रों में औद्योगिकरण को प्रोत्साहित किया जाय इन क्षेत्रों में विद्युत उपकरण बनाने वाले उद्योगों की व्यवस्था की जाय, जिससे उत्पादित वस्तु की आपूर्ति ग्रामीण क्षेत्रों मंे की जा सके।
9ण् प्रदेश की अर्थव्यवस्था में अनुकूल न्यून पूंजी गहन उत्पादन प्रणाली की आवश्यकता है। अतः बड़े पैमाने के विद्युत उत्पादक इकाईयों के स्थान पर लघु पैमाने की ऊर्जा उत्पादन इकाईयों की स्थापना की जाय।
10ण् कृषि क्षेत्रों को विद्युतीकरण की दिशा में प्राथमिकता प्रदान की जाय, जिसे कृषि को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।
11ण् आदिवासियों को स्थिर जीवन-यापन का अवसर प्रदान करने तथा उन्हें आर्थिक व्यवस्था के विकास के साथ जोड़ने के लिए आदिवासी क्षेत्र विकास योजना को विस्तृत क्षेत्रों में व्यावहारिक बनाया जाय।
12ण् हरिजन एवं आदिवासियों की तरह सभी समुदाय के निर्धन एवं कमजोर वर्गों के व्यक्तियों को विद्युतीकरण का लाभ देने के लिए कुटीर ज्योति योजना को और अधिक व्यवहारिक बनाया जाय।
मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के भूतपूर्व अध्यक्ष रा.वि. ओक का कहना है ‘‘ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के हर क्षेत्र का उत्तरोत्तर विस्तार हो रहा है, किन्तु उसके साथ ही उसमें कुछ दोष भी दिखाई देने लगे हैं। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि इन त्रुटियों को दूर कर ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को निर्दोष बनाया जाये, जिससे उसका पूर्ण लाभ त्वरित गति से गाँवों को उपलब्ध हो सके।’’
इस प्रकार स्पष्ट है कि यदि ग्रामीण विद्युतीकरण की दिशा में निहित इन कमजोरियों एवं दोषों का निराकरण किया जाता है तथा अन्यान्य आर्थिक संगठनों के साथ विद्युत मंडल का उचित सामंजस्य स्थापित किया जाता है, तब निःसंदेह मध्यप्रदेश अन्य राज्यों की भाँति न केवल शत-प्रतिशत ग्रामीण विद्युतीकरण के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा, बल्कि अपने प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का अनुकूल अवसर निर्मित करते हुए आर्थिक प्रगति की दिशा में दृढ़ आधार निर्मित कर सकेगा।
संदर्भरू
1ण् मध्यप्रदेश में ग्रामीण विद्युतीकरण रिकार्ड एवं उपलब्धियाँ, कुरूक्षेत्र, मई 1995, पृ.सं. 42
2ण् मध्यप्रदेश विद्युत मंडल, कोरबा, चतुर्वेदी, 1990
3ण् मध्यप्रदेश में ग्रामीण विद्युतीकरण, गुप्ता, नीलम एवं ए.के. पाण्डेय, कुरूक्षेत्र, मार्च 1991
4ण् मध्यप्रदेश का आर्थिक विकास, मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी, भोपाल, श्रीवास्तव ओ.एस. 1987
Received on 15.09.2011
Accepted on 05.10.2011
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Research J. Humanities and Social Sciences. 2(4): Oct. - Dec., 2011, 172-173